Thursday, 11 December 2014

मुसीबत से सामना।

बुरे दिनों के दौरान एक बेटी ने अपने पिता से कहा, “ये समय कितना कठिन है! मैं अब बहुत थक गई हूं, भीतर-ही-भीतर टूट गई हूं. जब तक हम एक मुसीबत से दो-चार होते हैं तब तक नई मुसीबतें मुंह बाए खड़ी हो जाती हैं. ऐसा कब तक चलेगा?”

पिता किसी जगह खाना बनाने का काम करता था. वह बिना कुछ बोले उठा और उसने सामने रखे चूल्हे पर तीन बर्तनों में पानी भरकर तेज आंच पर चढ़ा दिया.

जब पानी उबलने लगा, उसने एक बर्तन में आलू, दूसरे में अंडे, और तीसरे बर्तन में कॉफ़ी के बीज डाल दिए. फिर वह चुपचाप अपनी कुर्सी तक आकर बेटी की बातें सुनने लगा. वह वाकई बहुत दुखी थी और यह समझ नहीं पा रही थी कि पिता क्या कर रहे हैं.

कुछ देर बाद पिता ने बर्नर बंद कर दिए और आलू और अंडे को निकालकर एक प्लेट में रख दिया और एक कप में कॉफ़ी ढाल दी. फिर उसने अपनी बेटी से कहाः

“अब तुम बताओ कि ये सब क्या है?”

बेटी ने कहा, “आलू, अंडे और कॉफ़ी ही तो है. और क्या है?”

“नहीं, इन्हें करीब से देखो, छूकर देखो”, पिता ने कहा.

बेटी ने आलू को उठाकर देखा, वे नरम हो गए थे. अंडा पानी में उबलने पर सख्त हो गया था और कॉफ़ी से तरोताज़ा कर देने वाली महक उठ रही थी.

“लेकिन मैं समझी नहीं कि आप क्या बताना चाह रहे हैं”, उसने कहा.

पिता ने उसे समझाया, “मैंने आलू, अंडे और कॉफ़ी को एक जैसी यंत्रणा याने खौलते पानी से गुज़ारा, लेकिन इनमें से हर एक ने उसका सामना अपनी तरह से किया. आलू पहले तो कठोर और मजबूत थे, लेकिन खौलते पानी का सामना करने पर वे नर्म-मुलायम हो गए. वहीं दूसरी ओर, अंडे नाज़ुक और कमज़ोर थे और इनका पतला छिलका भीतर की चीज़ को बचाए रखता था. खौलते पानी ने उसको ही कठोर बना दिया. अब कॉफ़ी, इसका मामला सबसे जुदा है. उबलते पानी का साथ पाकर इन्होंने उसे ही बदल डाला. इन्होंने पानी को एक ऐसी चीज़ में रूपांतरित दिया जो तुम्हें खुशनुमा अहसास से सराबोर कर देती है.”

“अब तुम मुझे बताओ”, पिता ने पूछा, “जब मुसीबतें तुम्हारा द्वार खटखटाती हैं तो तुम क्या जवाब देती हो? तुम इन तीनों में से क्या हो?”

Once upon a time a daughter complained to her father that her life was miserable and that she didn’t know how she was going to make it. She was tired of fighting and struggling all the time. It seemed just as one problem was solved, another one soon followed. Her father, a chef, took her to the kitchen. He filled three pots with water and placed each on a high fire.

Once the three pots began to boil, he placed potatoes in one pot, eggs in the second pot and ground coffee beans in the third pot. He then let them sit and boil, without saying a word to his daughter. The daughter, moaned and impatiently waited, wondering what he was doing. After twenty minutes he turned off the burners. He took the potatoes out of the pot and placed them in a bowl. He pulled the eggs out and placed them in a bowl. He then ladled the coffee out and placed it in a cup.

Turning to her, he asked. “Daughter, what do you see?”

“Potatoes, eggs and coffee,” she hastily replied.

“Look closer”, he said, “and touch the potatoes.” She did and noted that they were soft.
He then asked her to take an egg and break it. After pulling off the shell, she observed the hard-boiled egg. Finally, he asked her to sip the coffee. Its rich aroma brought a smile to her face.

“Father, what does this mean?” she asked.

He then explained that the potatoes, the eggs and coffee beans had each faced the same adversity-the boiling water. However, each one reacted differently. The potato went in strong, hard and unrelenting, but in boiling water, it became soft and weak. The egg was fragile, with the thin outer shell protecting its liquid interior until it was put in the boiling water. Then the inside of the egg became hard. However, the ground coffee beans were unique. After they were exposed to the boiling water, they changed the water and created something new.

“Which one are you?” he asked his daughter. “When adversity knocks on your door, how do you respond? Are you a potato, an egg, or a coffee bean?”

Tuesday, 9 December 2014

Love all and forgive all.

When I'll be dead.....,
Your tears will flow,..
But I won 't know...
Cry for me now instead !

You will send flowers,..
But I won't see...
Send them now instead !

You'll say words of praise,..
But I won't hear..
Praise me now instead !

You'll forget my faults,..
But I won't know...
Forget them now, instead !

You'll miss me then,...
But I won't feel...
Miss me now, instead

You'll wish...
you could have spent more time with me,...
Spend it now instead !!

Moral......

''Spend time with every person around you, your families, friends, lover, acquainted....
Make them feel  Special ,
Because  you never know when time will take them away from you forever''..

Life is too short...
Love  all and Forgive all.

Monday, 8 December 2014

ईश्वर क्या चाहते हैं?

एक दिन एक छोटे बच्चे ने अपनी माँ को उपवास करते देखा।
उसने माँ से पुछा कि वो खा क्यो नही रही है और उसे पेट दर्द हो रहा होगा। माँ ने कहा कि मै ये इसलिए कर रही हूँ ताकि भगवान हमारी मनोकामना पूरी करेंगे।
बच्चे ने सोचा हो सकता है खुद को तकलीफ देने से उसे भी जो चाहिए वो मिल जाएगा।
अगले दिन माँ ने देखा कि उसका बेटा कड़ी धूप मे खड़ा है।
माँ ने कारण पूछा तो बच्चे ने कहा, उसे एक खिलौना चाहिए इसलिए वह अपने आप को तकलीफ दे रहा था। तब माँ ने कहा, बेटे अगर तुम मुझसे प्यार से मांगते तो मै तुम्हे खिलौना ला देती, मुझ पर विश्वास करो ऒर तुम्हे अपने आप को दर्द देने की जरुरत नही।
मै तुमसे प्यार करती हूँ और इस तरह तुम्हे नही देख सकती।
इस पर बच्चे ने कहा, क्या भगवान तुमसे प्यार नही करते? वह तुम्हे उपवास करते और तकलीफ लेते देख खुश होते है?
तुम भी तो उनसे प्यार से, बिना दर्द लिए,जो चाहिए मांग सकती हो
ईश्वर पर विश्वास रखें.....सामान्य जीवन जियें... विनम्रता से चलें और ईमानदारी पूर्वक प्यार करें.. !

ईश्वर प्रेम।

एक बादशाह अपने गुलाम से बहुत प्यार करता था ।
एक दिन दोनों जंगल से गुज़र रहे थे, वहां एक वृक्ष पर एक ही फल लगा था ।
हमेशा की तरह बादशाह ने एक फांक काटकर गुलाम को खाने के लिये दी। गुलाम को स्वाद लगी, उसने धीरे- धीरे सारी फांक लेकर खाली और आखरी फांक भी झपट कर खाना चाहता था।
बादशाह बोला, हद हो गई । इतना स्वाद ।
गुलाम बोला, हाँ बस मुझे ये भी दे दो। बादशाह से ना रहा गया, उसने
आखरी फांक खुदके मुह में ड़ाल ली। वो स्वाद तो क्या होनी थी, कडवी जहर थी।
बादशह हैरान हो गया और गुलाम से बोला, "तुम इतने कडवे फल को आराम से खा रहे थे और कोई शिकायत भी नहीं की ।"
गुलाम बोला, "जब अनगिनत मीठे
फल इन्ही हाथो से खाये और अनगिनत सुख इन्ही हाथो से मिले तो इस छोटे से कडवे फल के लिये शिकायत कैसी।"
मालिक मैने हिसाब रखना बंद कर दिया है, अब तो मै इन देने वाले हाथों को ही देखता हूँ । बादशाह की आँखों में आंसू आ गए । बादशाह ने कहा, इतना प्यार और उस गुलाम को गले से लगा लिया ।
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Moral- हमे भी परमात्मा के हाथ से भेजे गये दुःख और सुख को ख़ुशी ख़ुशी कबूल करना चाहिये । परमात्मा से शिकायत नहीं करनी चाहिये....

प्रभु के प्यारे.....

एक संत ने एक रात स्वप्न देखा कि उनके पास एक देवदूत आया है, देवदूत के हाथ में एक सूची है। उसने कहा, यह उन लोगों की सूची है, जो प्रभु से प्रेम करते हैं।’ संत ने कहा, मैं भी प्रभु से प्रेम करता हूँ, मेरा नाम तो इसमें अवश्य होगा।’ देवदूत बोला, नहीं, इसमें आप का नाम नहीं है।’ संत उदास हो गए - फिर उन्होंने पूछा, इसमें मेरा नाम क्यों नहीं है। मैं ईश्वर से ही नहीं अपितु गरीब, असहाय, जरूरतमंद सबसे प्रेम करता हूं। मैं अपना अधिकतर समय दूसरो की सेवा में लगाता हूँ, उसके बाद जो समय बचता है उसमें प्रभु का स्मरण करता हूँ -
तभी संत की आंख खुल गई।दिन में वह स्वप्न को याद कर उदास थे, एक शिष्य ने उदासी का कारण पूछा तो संत ने स्वप्न की बात बताई और कहा, वत्स, लगता है सेवा करने में कहीं कोई कमी रह गई है।’ तभी मैं ईश्वर को प्रेम करने वालो की सूची में नहीं हूँ - दूसरे दिन संत ने फिर वही स्वप्न देखा, वही देवदूत फिर उनके सामने खड़ा था। इस बार भी उसके हाथ में कागज था। संत ने बेरुखी से कहा, अब क्यों आए हो मेरे पास - मुझे प्रभु से कुछ नहीं चाहिए।’ देवदूत ने कहा, आपको प्रभु से कुछ नहीं चाहिए, लेकिन प्रभु का तो आप पर भरोसा है। इस बार मेरे हाथ में दूसरी सूची है।’ संत ने कहा, तुम उनके पास जाओ जिनके नाम इस सूची में हैं, मेरे पास क्यों आए हो ?’

देवदूत बोला, इस सूची में आप का नाम सबसे ऊपर है।’ यह सुन कर संत को आश्चर्य हुआ - बोले, क्या यह भी ईश्वर से प्रेम करने वालों की सूची है।’ देवदूत ने कहा, नहीं, यह वह सूची है जिन्हें प्रभु प्रेम करते हैं, ईश्वर से प्रेम करने वाले तो बहुत हैं, लेकिन प्रभु उसको प्रेम करते हैं जो सभी से प्रेम करता हैं। प्रभु उसको प्रेम नहीं करते जो दिन रात कुछ पाने के लिए प्रभु का गुणगान करते है।’ - प्रभु आप जैसे निर्विकार, निस्वार्थ लोगो से ही प्रेम करते है । संत की आँखे गीली हो चुकी थी - उनकी नींद फिर खुल गयी - वो आँसू अभी भी उनकी आँखों में थे...

"जो सचमुच दयालु है, वही सचमुच बुद्धिमान है, और जो दूसरों से प्रेम नहीं करता उस पर ईश्वर की कृपा नहीं होती"
"भक्ति के अन्दर भगवान को खींचने की शक्ति है. बाकी सब साधन भगवान को सिर्फ प्रसन्न कर सकते हैं, खींच नहीं सकते. भक्ति का स्वरुप निराला होता है."

बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय ।
जय जय श्री राधे।

कुछ उदास कुछ रूठे से वो।

आज है वो कुछ उदास उदास से
न जाने क्यों नही दे देते ये उदासी मुझे वो
आज है वो कुछ रूठे रूठे से
न जाने क्यों नही नही मान जाते अब वो
आज है वो कुछ अलग अलग से
न जाने क्यों नही हो जाते पहले जैसे वो
आज है वो कुछ बुझे बुझे से
न जाने क्यों नही हंस के दिखा देते अब वो

आँख खुलते ही ओझल हो जाते हो तुम,
ख्वाब बन के ऐसे क्यों सताते हो तुम…
मासूम सी मोहब्बत का बस इतना सा फसाना है
काग़ज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है
क्या शर्त-ए-मोहब्बत है क्या शर्त-ए ज़माना है
आवाज़ भी ज़ख़्मी है ओर एक गीत भी गाना है
उस पार उतरने की उम्मीद बहुत कम है
कश्ती भी पुरानी है ओर तूफ़ान भी आना है
समझे या ना समझे वो अंदाज़-ए-मोहब्बत का
एक ख़ास को अपनी आँखो से एक शेर भी सुनाना है

गमों को भुलाने का एक सहारा ही सही,
मेरे मुरझाए हुए दिल को बहलाते हो तुम…
दूर तक बह जाते है जज़्बात तन्हा दिल के,
हसरतों के क़दमों से लिपट जाते हो तुम…
शीश महल की तरह लगते हो मुझको तो,
खंडहर हुई खव्हाइशों को बसाते हो तुम…
यादों की तरह क़ैद रहना मेरी आँखों मे,
आँसू बन कर पलकों पे चले आते हो तुम…
तुम्हारी अधूरी सी आस मे दिल ज़िंदा तो है
साँस लेने की मुझको वजह दे जाते हो तुम…
ना ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए,
दिल मे मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए,
ना दुआ, ना खुदा, ना हाथों मे कोई तलवार चाहिए,
मुसीबत मे किसी एक प्यारे साथी का हाथों मे हाथ चाहिए,
कहूँ ना मै कुछ, समझ जाए वो सब कुछ,
दिल मे उस के, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए,
उस दोस्त के चोट लगने पर हम भी दो आँसू बहाने का हक़ रखें,
और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल चाहिए,
मैं तो तैयार हूँ हर तूफान को तैर कर पार करने के लिए,
बस साहिल पर इन्तज़ार करता हुआ एक सच्चा दिलदार चाहिए,
उलझ सी जाती है ज़िन्दगी की किश्ती दुनिया की बीच मँझधार मे,
इस भँवर से पार उतारने के लिए किसी के नाम की पतवार चाहिए,
अकेले कोई भी सफर काटना मुश्किल हो जाता है,
मुझे भी इस लम्बे रास्ते पर एक अदद हमसफर चाहिए,
यूँ तो ‘मित्र’ का तमग़ा अपने नाम के साथ लगा कर घूमता हूँ,
पर कोई, जो कहे सच्चे मन से अपना दोस्त, ऐसा एक दोस्त चाहिए!

Friday, 5 December 2014

निष्काम भक्ति

निष्काम भक्ति...........

एक भक्त था, वह रोज बिहारी जी के मंदिर जाता था। पर मंदिर में बिहारी जी की जगह उसे एक ज्योति दिखाई देती थी, मंदिर में बाकी के सभी भक्त कहते- वाह ! आज बिहारी जी का श्रंगार कितना अच्छा है, बिहारी जी का मुकुट ऐसा, उनकी पोशाक ऐसी,, तो वह भक्त सोचता... बिहारी जी सबको दर्शन देते है, पर मुझे क्यों केवल एक ज्योति दिखायी देती है । हर दिन ऐसा होता। एक दिन बिहारी जी से बोला ऐसी क्या बात है की आप सबको तो दर्शन देते है पर मुझे दिखायी नहीं देते । कल आप को मुझे दर्शन देना ही पड़ेगा.अगले दिन मंदिर गया फिर बिहारी जी उसे जोत के रूप में दिखे । वह बोला बिहारी जी अगर कल मुझे आपने दर्शन नहीं दिये तो में यमुना जी में डूबकर मर जाँऊगा ।

उसी रात में बिहारी जी एक कोड़ी के सपने में आये जो कि मंदिर के रास्ते में बैठा रहता था, और बोले तुम्हे अपना कोड़ ठीक करना है वह कोड़ी बोला - हाँ भगवान, भगवान बोले - तो सुबह मंदिर के रास्ते से एक भक्त निकलेगा तुम उसके चरण पकड़ लेना औरतब तक मत छोड़ना जब तक वह ये न कह दे कि बिहारी जी तुम्हारा कोड़ ठीक करे .अगले दिन वह कोड़ी रास्ते में बैठ गया जैसे ही वह भक्त निकला उसने चरण पकड़ लिए और बोला पहले आप कहो कि मेरा कोड़ ठीक हो जाये ।

वह भक्त बोला मेरे कहने से क्या होगा आप मेरे पैर छोड दीजिये, कोड़ी बोला जब तक आप ये नहीं कह देते की बिहारी जी तुम्हारा कोड़ ठीक करे तक मैं आपके चरण नहीं छोडूगा. भक्त वैसे ही चिंता में था,कि बिहारी जी दर्शन नहीं दे रहे, ऊपर से ये कोड़ी पीछे पड़ गया तो वह झुँझलाकर बोला जाओ बिहारी जी तुम्हारा कोड़ ठीक करे और मंदिर चला गया, मंदिर जाकर क्या देखता है बिहारीजी के दर्शन हो रहे हैं,बिहारेजी से पूछने लगा अब तक आप मुझे दर्शन क्यों नहीं दे रहे थे, तो बिहारीजी बोले: तुम मेरे निष्काम भक्त हो आज तक तुमने मुझसे कभी कुछ नहीं माँगा इसलिए में क्या मुँह लेकर तुम्हे दर्शन देता, यहाँ सभी भक्त कुछ न कुछ माँगते रहते है इसलिए में उनसे नज़रे मिला सकता हूँ, पर आज तुमने रास्ते में उस कोड़ी से कहा - कि बिहारी जी तुम्हारा कोड़ ठीक कर दे इसलिए में तुम्हे दर्शन देने आ गया।

सार - भगवान की निष्काम भक्ति ही करनी चाहिये, भगवान की भक्ति करके यदि संसार के ही भोग, सुख ही माँगे तो फिर वह भक्ति नहीं वह तो सोदेबाजी है...!!!

बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय........
जय जय श्री राधे...........