8 अच्छी आदतों से सुधारें अपना घर :
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अगर आपको कहीं पर भी थूकने की आदत है तो यह निश्चित है
कि आपको यश, सम्मान अगर मुश्किल से मिल भी जाता है
तो कभी टिकेगा ही नहीं .
यह काम wash basin में ही कर आया करें !
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जिन लोगों को अपनी जूठी थाली या बर्तन वहीं उसी जगह पर छोड़ने की आदत होती है उनको सफलता कभी भी स्थायी रूप से नहीं मिलती.!
बहुत मेहनत करनी पड़ती है और ऐसे लोग अच्छा नाम नहीं कमा पाते.!
अगर आप अपने जूठे बर्तनों को उठाकर उनकी सही जगह पर रख आते हैं तो चन्द्रमा और शनि का आप सम्मान करते हैं !
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जब भी हमारे घर पर कोई भी बाहर से आये, चाहे मेहमान हो या कोई काम करने वाला, उसे स्वच्छ पानी जरुर पिलाएं ! तथा अतिथि को देव मान कर आदर सत्कार करें
ऐसा करने से हम राहू का सम्मान करते हैं.!
जो लोग बाहर से आने वाले लोगों को स्वच्छ पानी हमेशा पिलाते हैं उनके घर में कभी भी राहू का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता.!
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घर के पौधे आपके अपने परिवार के सदस्यों जैसे ही होते हैं, उन्हें भी प्यार और थोड़ी देखभाल की जरुरत होती है.!
जिस घर में सुबह-शाम पौधों को पानी दिया जाता है तो हम बुध, सूर्य और चन्द्रमा का सम्मान करते हुए परेशानियों से डटकर लड़ पाते हैं.!
जो लोग नियमित रूप से पौधों को पानी देते हैं, उन लोगों को depression, anxiety जैसी परेशानियाँ जल्दी से नहीं पकड़ पातीं.!
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जो लोग बाहर से आकर अपने चप्पल, जूते, मोज़े इधर-उधर फैंक देते हैं, उन्हें उनके शत्रु बड़ा परेशान करते हैं.!
इससे बचने के लिए अपने चप्पल-जूते तरीके से लगाकर रखें, आपकी प्रतिष्ठा बनी रहेगी
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उन लोगों का राहू और शनि खराब होगा, जो लोग जब भी अपना बिस्तर छोड़ेंगे तो उनका बिस्तर हमेशा फैला हुआ होगा, सिलवटें ज्यादा होंगी, चादर कहीं,तकिया कहीं,कम्बल कहीं ?
उसपर ऐसे लोग अपने पुराने पहने हुए कपडे तक फैला कर रखते हैं ! ऐसे लोगों की पूरी दिनचर्या कभी भी व्यवस्थित नहीं रहती, जिसकी वजह से वे खुद भी परेशान रहते हैं और दूसरों को भी परेशान करते हैं.!
इससे बचने के लिए उठते ही स्वयं अपना बिस्तर समेट दें.!
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पैरों की सफाई पर हम लोगों को हर वक्त ख़ास ध्यान देना चाहिए,
जो कि हम में से बहुत सारे लोग भूल जाते हैं! नहाते समय अपने पैरों को अच्छी तरह से धोयें, कभी भी बाहर से आयें तो पांच मिनट रुक कर मुँह और पैर धोयें.!
आप खुद यह पाएंगे कि आपका चिड़चिड़ापन कम होगा, दिमाग की शक्ति बढेगी और क्रोध धीरे-धीरे कम होने लगेगा.!
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रोज़ खाली हाथ घर लौटने पर धीरे-धीरे उस घर से लक्ष्मी चली जाती है और उस घर के सदस्यों में नकारात्मक या निराशा के भाव आने लगते हैं.!
इसके विपरित घर लौटते समय कुछ न कुछ वस्तु लेकर आएं तो उससे घर में बरकत बनी रहती है.!
उस घर में लक्ष्मी का वास होता जाता है.!
हर रोज घर में कुछ न कुछ लेकर आना वृद्धि का सूचक माना गया है.!
ऐसे घर में सुख, समृद्धि और धन हमेशा बढ़ता जाता है और घर में रहने वाले सदस्यों की भी तरक्की होती है.!
स्वच्छता में लक्ष्मी जी का वास होता है तथा हमारे अच्छे दिन हमारे अच्छे विचारों, अच्छे कर्मों व अच्छे आचरण पर निर्भर करतें हैं।
Tuesday, 30 September 2014
अच्छी आदतें
Monday, 29 September 2014
सौंधी खुशबू
सौंधी खुशबू
Saundhi Khushbu
मेरी पत्नी ने कुछ दिनों पहले घर की छत पर कुछ गमले रखवा दिए। फिर किसी नर्सरी से कुछ पौधे मंगवा कर छत पर ही उसने एक छोटा सा गार्डेन बना लिया। वो नियमित रूप से उनमें पानी देती है और माली को बुला कर खाद वगैरह डलवा देती है।
शुरू शुरू में मुझे उसकी इस हरकत पर हंसी आई लेकिन ये सोच कर चुप रहा कि चलो कहीं तो अपना दिल लगा रही है। लेकिन पिछले दिनों मैं छत पर गया तो ये देख कर हैरान रह गया कि कई गमलों में फूल खिल गए हैं, नींबू के पौधे में दो नींबू भी लटके हुए हैं, और दो चार हरी मिर्च भी लटकी हुई नज़र आई। मैं कुछ देर वहीं छत पर बैठ गया। उन पौधों की ओर देखता रहा। अचानक मैंने देखा कि पिछले हफ्ते उसने बांस का जो पौधा गमले में लगाया था, उस गमले को घसीट कर दूसरे गमले के पास कर रही थी।
गमला भारी था, और उसे ऐसा करने में मुश्किल आ रही थी। मैंने उसे रोकते हुए कहा कि गमला वहीं ठीक है, तुम उसे क्यो घसीट रही हो?
पत्नी ने मुझसे कहा कि यहां ये बांस का पौधा सूख रहा है, इसे खिसका कर इस पौधे के पास कर देते हैं।
मैं हंस पड़ा और कहा, "अरे पौधा सूख रहा है तो खाद डालो, पानी डालो इसे खिसका कर किसी और पौधे के पास कर देने से क्या होगा?"
पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा, "ये
पौधा यहां अकेला है इसलिए मुर्झा रहा है। इसे इस पौधे के पास कर देंगे तो ये फिर लहलहा उठेगा। पौधे अकेले में सूख जाते हैं, लेकिन उन्हें अगर किसी और पौधे का साथ मिल जाए तो जी उठते हैं।"
मेरी पत्नी बोल रही थी और मैं सुन रहा था।
क्या सचमुच पौधे अकेले में सूख जाते हैं?
क्या सचमुच पौधे को पौधे का साथ चाहिए होता है?
बहुत अजीब सी बात थी। मेरे लिए ये सुनना ही नया था। लेकिन सुन रहा था और फिर सोच रहा था।
पत्नी गमले को खींच कर दूसरे गमले के पास करके खुश हो गई और मैं उस पौधे की ओर देख कर कहीं खो गया। एक-एक कर कई तस्वीरें आखों के आगे बनती चली गईं। मां की मौत के बाद पिताजी कैसे एक ही रात में बूढ़े, बहुत बूढ़े हो गए थे। हालांकि मां के जाने के बाद सोलह साल तक वो रहे, लेकिन सूखते हुए पौधे की तरह। मां के रहते हुए जिस पिताजी को मैंने कभी उदास नही देखा था, वो मां के जाने के बाद खामोश से हो गए थे। हालांकि हमारे साथ वो हमारी तरह ही जीते थे, लेकिन कई बार मैंने उन्हें रात के अंधेरे में अकेले सुबकते हुए सुना था।मेरी पत्नी कह रही थी, "अकेले में पौधे सारी रात सुबकते हैं।"
वो कह रही थी कि ये तो तुमने
चौथी कक्षा में ही पढ़ लिया होगा कि पौधों में भी जान होती है, और जब जान होती है तो ये हंसते और रोते भी हैं। देखो न मिर्च कैसी लहलहा रही है, नींबू इस छोटे से गमले में भी कैसा फल रहा है। ये सब साथ का असर है। मिर्च के साथ नींबू और नींबू के साथ तरोई, तरोई के साथ सफेद फूल…
बांस का पौधा जरा अलग सा था तो इसे माली ने अकेले में रख दिया था। माली ने ये सोचने की जहमत भी नहीं उठाई कि इतना छोटा पौधा अकेले मेें कैसे रह सकता है? देखो तो सही ये अकेला पौधा कितना डरा हुआ सा लग रहा है? बेचारा डर के मारे सूख रहा है। देखना कल से ये पौधा कैसे हरा नजर आने लगता है।मुझे पत्नी के विश्वास पर पूरा विश्वास हो रहा था। लग रहा था कि सचमुच पौधे अकेले में सूख जाते होंगे।
बचपन में मैं एक बार बाज़ार से एक छोटी सी रंगीन मछली खरीद कर लाया था और उसे शीशे के जार में पानी भर कर रख दिया था।मछली सारा दिन गुमसुम रही। मैंने उसके लिए खाना भी डाला, लेकिन वो चुपचाप इधर-उधर पानी में अनमना सा घूमती रही। सारा खाना जार की तलहटी में जाकर बैठ गया, मछली ने कुछ नहीं खाया। दो दिनों तक वो ऐसे ही रही, और एक सुबह मैंने देखा कि वो पानी की सतह पर उल्टी पड़ी थी। इस एक घटना के बाद मेरे मन से मछली पालने की इच्छा हमेशा के लिए खत्म हो गई। लेकिन आज मुझे घर में पाली वो छोटी सी मछली याद आ रही थी।
बचपन में किसी ने मुझे ये
नहीं बताया था कि एक मछली कभी बहुत दिनों तक नहीं जीती। अगर मालूम होता तो कम से कम दो या तीन या और ढेर सारी मछलियां खरीद लाता और मेरी वो प्यारी मछली यूं तन्हा न मर जाती।
मुझे लगता है कि संसार में
किसी को अकेलापन पसंद नहीं ।
आदमी हो या पौधा, हर किसी को किसी न किसी के साथ की ज़रुरत होती है।
आप अपने आसपास झांकिए, अगर कहीं कोई अकेला दिखे तो उसे अपना साथ दीजिए, उसे मुर्झाने से बचाइए। अगर आप अकेले हों, तो आप भी किसी का साथ लीजिए, आप खुद को भी मुर्झाने से रोकिए। पहले भी लिखा था, आज दुहरा रहा हूं
कि अकेलापन संसार में सबसे बड़ी सजा है।
गमले के पौधे को तो हाथ से खींच कर एक दूसरे पौधे के पास किया जा सकता है,
लेकिन आदमी को करीब लाने के लिए जरुरत होती है रिश्तों को समझने की, सहेजने की और समेटने की।
अगर मन के किसी कोने में आपको लगे कि ज़िंदगी का रस सूख रहा है, जीवन मुर्झा रहा है तो उस पर रिश्तों के प्यार का रस डालिए। खुश रहिए और मुस्कुराइए।
कोई यूं ही किसी और की गलती से आपसे दूर हो गया हो तो उसे अपने करीब लाने की कोशिश कीजिए और हो जाइए हरा-भरा।
Wednesday, 24 September 2014
नवरात्र
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चंद्रघण्टेति कुष्माण्डेति चतुर्थकं।।
पंचमं स्कंदमातेति षष्ठम् कात्यनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति च अष्टमं।।
नवमं सिद्धीदात्री च नव दुर्गा प्रकीर्तितः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रहामणैव महात्मये ।।
माँ जगदंबा आप सभी की झोली सुख समृद्धि से भरें ऐसी हम कामना करते हैं । आप सभी को नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएँ एवम् बधाइयाँ।
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नवरात्र
प्रथम दिवस "माँ शैलपुत्री"
"वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्"॥
माँ दुर्गा पहले स्वरूप में 'शैलपुत्री' के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को 'मूलाधार' चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है।
वृषभ-स्थिता इन माताजी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। तब इनका नाम 'सती' था। इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था।
एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।
अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।'
शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।
सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।
परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।
वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।
सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था।
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शैलपुत्री' देवी का विवाह भी शंकरजी से ही हुआ। पूर्वजन्म की भाँति इस जन्म में भी वे शिवजी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।
Tuesday, 16 September 2014
Tuesday, 9 September 2014
प्रार्थना
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है, (2)
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है
पतवार के बिना हे, मेरी नाव चल रही है,
...
हैरान हे ज़माना, मंजिल भी मिल रही है (2)...
करता नहीं में कुछ भी, सब काम हो रहा है...
करते हो तुम कन्हैया.......
तुम साथ हो जो मेरे, किस चीज़ की कमी है,
किसी और चीज़ की अब, दरकार ही नहीं नहीं है...
तेरे साथ से गुलाम, गुलफाम हो रहा है...
करते हो तुम कन्हैया.......
मैं तो नहीं हूँ काबिल, तेरा प्यार कैसे पाऊ,
टूटी हुई वाणी से, गुणगान कैसे ग़ाऊ,
तेरी प्रेरणा से हे, ये नाम हो रहा है...
करते हो तुम कन्हैया.......
मुझे हर कदम कदम पर, तुने दिया सहारा,
मेरी ज़िन्दगी बदल दी, तुने करके एक इशारा,
एहसान पे तेरा ये, एहसान हो रहा है...
करते हो तुम कन्हैया.......
तूफ़ान आंधियों में, तुने हे मुजह्को थामा,
तुम कृष्ण बन के आये, मैं जब बना सुदामा,
तेरा करम ये मुझपर, सरे आम हो रहा है...
करते हो तुम कन्हैया.......
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है, (2)
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है...
Saturday, 6 September 2014
Doctors
((एक Doctor का दर्द))))}}}}●●●
मन तो मेरा भी करता है मॉर्निग वॉक पर
जाऊं मैं,
सुबह सवेरे मालिश करके थोड़ी दंड लगाऊं मैं,
बूढ़ी मॉ के पास में बैठूं और पॉव दबाऊँ मैं
लेकिन मैं इतना भी नही कर पाता,
क्योंकि मैं वो मानव हूँ जो मानव
नही समझा जाता ******************************
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हमने बर्थ डे की पिघली हुई
मोमबत्तियॉ देखी है,
हमने पापा की राह
तकती सूनी अंखियाँ देखी हैं,
हमने पिचके हुए रंगीन गुब्बारे देखे हैं,
पर बच्चे के हाथ से मैं केक नही खा पाता,
क्योंकि मैं वो मानव हूँ जो मानव
नही समझा जाता ******************************
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निज घर करके अंधेरा सबके दिये जलवाये हैं,
कहीं सजाया भोग कहीं गोवर्धन पुजवायें हैं,
और भाई बहिन को यमुना स्नान करवाये हैं,
पर तिलक बहिन का मेरे माथे तक नही आ
पाता,
क्योंकि मैं वो मानव हूँ जो मानव
नहीं समझा जाता
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हमने ईद दिवाली दशहरा खूब मनाये हैं,
रोज निकाले जुलूस और गुलाल रंग बरसाए हैं,
ईस्टर,किर्समस,वैलेंटाइन और फ्राइडे मनाये हैं,
पर मैं कोई होलीडे संडे नही मना पाता,
क्योंकि मैं वो मानव हूँ जो मानव
नहीं समझा जाता
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घनी रात सुनसान राहों पर जब कोई जाता है,
हर पेड़ पौधा भी वहॉ चोर नजर आता है,
कड़कड़ाती ठंड में जब रास्ता भी सिकुड़
जाता है,
लेकिन Doctor उसी वक़्त घर जाता है,
क्योंकि यह वो मानव है जो मानव
नही समझा जाता
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नहीं चाहता मैं कोई सम्मान
दिलवाया जाय,
नही चाहता हमें सिर आँखों पर बैठाया जाय,
चाहत है बस हफ्ते में एक छुट्टी मिल जाय,
बस सन्डे को कोई patient ना बुलाये।
हमारी तरफ भी आज के युग मे कोई प्यारी नजर उठ
जाय,
हम भी मानव हैं और हमें बस मानव समझा जाय
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Friday, 29 August 2014
Bring your own sunshine.
Nice message:
I was cycling and noticed a person in front of me, about 1/4 of Km. I could tell he was cycling a little slower than me and decided to try to catch him. I had about a km to go on the road before turning off.
So I started cycling faster and faster and every block, I was gaining on him just a little bit. After just a few minutes I was only about 100 yards behind him, so I really picked up the pace and pushed myself. You would have thought I was cycling in the last leg of London Olympic triathlon
.
Finally,I caught up with him and passed him by. On the inside I felt so good. “I beat him" of course, but he didn't even know we were racing.
After I passed him, I realized that I had been so focused on competing against him that I had missed my turn, had gone nearly six blocks past it and had to turn around and go all back.
Isn't that what happens in life when we focus on competing with co-workers, neighbours, friends, family, trying to outdo them or trying to prove that we are more successful or more important? We spend our time and energy running after them and we miss out on our own paths to our destinies.
Moral :
The problem with unhealthy competition is that it’s a never ending cycle. There will always be somebody ahead of you, someone with better job, nicer car, more money in the bank, more education, a prettier wife, a more handsome husband, better behaved children, etc.
Take what Life has given you, the height, weight & personality. Dress well & wear it proudly! You'll be blessed by it. Stay focused and live a healthy life. There's no competition in DESTINY.
Run your own RACE and wish others WELL!!!
Wherever You Go,
No Matter What The Weather,
Always Bring Your Own Sunshine...